फ़लसफ़ा-ए-राज़
२३॰०८॰२०११
"कर दे मुर्दा नसों को रवाँ आदमी,
कर दे ग़ुज़रे पलों को जवाँ आदमी।
जब भी बाग़ी हुआ ,सल्तनत के लिये,
कर दे खुद ही खड़ा कारवाँ आदमी,
जब आमादा हुआ वो चमन के लिये,
ज़हाँ में सबसे बड़ा बाग़बाँ आदमी,
जब ज़रूरत पड़ी तो वो ठंडी हवा,
जब ज़रूरत पड़ी तो तूफ़ाँ आदमी,
ईश़्क़ है आग़ का एक दरिया मग़र,
आज़माईश में शाहेज़हाँ आदमी,
उसकी दुनिया में देखो,जहाँ तक भी तुम,
बस यहाँ आदमी और वहाँ आदमी,
आए वहश़ी-दरिन्दे जो लूटे और गए,
पर जो मिट न सका वो निशाँ आदमी,
औ
ग़र ख़ुदाई को क़त्ल "राज़" तुमने किया,
तो फिर ज़माने में बाक़ी कहाँ आदमी।"
(लगातार)
-संजय कुमार शर्मा "राज़"

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