१२.०८.२०१३
"ख़्वाब"
"वस्ल के मीठे सब्ज़ बाग़, दिखाता क्यों है,
कर के मुझसे ज़फ़ा वो ख़्वाब में आता क्यों है,
कुरेदता है, मेरे सोए हुए ज़ख़्मों को,
लगा के आग, नींद से वो जगाता क्यों है,
मेरा दिलबर है या के, दोस्त! वो रहबर कोई,
ढँक के चेहरा नक़ाब में, वो सताता क्यों है,
लूट कर वो मेरे अहसास और चैनोसुकूँ,
सब कुछ दे देने का अहसान, जताता क्यों है,
उतर के, यार! सरेशब वो चाँद के आगे,
पानी में आग, 'राज़' गोते लगाता क्यों है।।"
संजय कुमार शर्मा 'राज़'
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Saturday, August 17, 2013
Saturday, January 19, 2013
मैकदा-ए-राज़
मैकदा-ए-राज़
१४॰९॰९३, 8 PM
बिना शराब मेरी शब नहीं,सहर भी नहीं ।
ये वो जहाँ है,जहाँ जान की क़दर भी नहीं,
बिना शराब मेरी शब नहीं,सहर भी नहीं ।
चौबीसों घंटे मेरे पीने का वक्त होता है,
राज़ सुबहा वज़ू शराब से मुँह धोता है,
पीता है वो पाँचो वक़्त उफ़ मगर भी नहीं,
बिना शराब मेरी शब नहीं,सहर भी नहीं ।
जामो महफिल ज़न्नती बू से महकती सी लगे,
हलक़ से उतरे ज़िगर,आग दहकती सी लगे,
जहाँ ये चीज़ नहीं मिलती,है वो शहर ही नहीं,
बिना शराब मेरी शब नहीं,सहर भी नहीं ।
घंटे-घंटे में,घूँट-घूँट,धीरे-धीरे तू पी,
लम्हा-लम्हा हो आशिकाना,खुशगवार तू जी,
इस जहाँ में शराब जैसी हमनज़र ही नहीं,
बिना शराब मेरी शब नहीं,सहर भी नहीं ।
समंदरों में बूँद-बूँद गिर के पानी भरे,
क़तरा-क़तरा तमीज़ से लहू इंसानी भरे,
हुक़्मे क़ाइनात के बिना उठे लहर भी नहीं,
बिना शराब मेरी शब नहीं,सहर भी नहीं ।
आज़मा कर के देख लो,ये ज़हर जला देगा,
अग़र हो लाश बन चुके तो भी ये चला देगा,
बग़ैर जाम हलावत नहीं,ज़हर भी नहीं,
बिना शराब मेरी शब नहीं,सहर भी नहीं ।
॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰(लगातार)
-संजय कुमार शर्मा राज़
१४॰९॰९३, 8 PM
बिना शराब मेरी शब नहीं,सहर भी नहीं ।
ये वो जहाँ है,जहाँ जान की क़दर भी नहीं,
बिना शराब मेरी शब नहीं,सहर भी नहीं ।
चौबीसों घंटे मेरे पीने का वक्त होता है,
राज़ सुबहा वज़ू शराब से मुँह धोता है,
पीता है वो पाँचो वक़्त उफ़ मगर भी नहीं,
बिना शराब मेरी शब नहीं,सहर भी नहीं ।
जामो महफिल ज़न्नती बू से महकती सी लगे,
हलक़ से उतरे ज़िगर,आग दहकती सी लगे,
जहाँ ये चीज़ नहीं मिलती,है वो शहर ही नहीं,
बिना शराब मेरी शब नहीं,सहर भी नहीं ।
घंटे-घंटे में,घूँट-घूँट,धीरे-धीरे तू पी,
लम्हा-लम्हा हो आशिकाना,खुशगवार तू जी,
इस जहाँ में शराब जैसी हमनज़र ही नहीं,
बिना शराब मेरी शब नहीं,सहर भी नहीं ।
समंदरों में बूँद-बूँद गिर के पानी भरे,
क़तरा-क़तरा तमीज़ से लहू इंसानी भरे,
हुक़्मे क़ाइनात के बिना उठे लहर भी नहीं,
बिना शराब मेरी शब नहीं,सहर भी नहीं ।
आज़मा कर के देख लो,ये ज़हर जला देगा,
अग़र हो लाश बन चुके तो भी ये चला देगा,
बग़ैर जाम हलावत नहीं,ज़हर भी नहीं,
बिना शराब मेरी शब नहीं,सहर भी नहीं ।
॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰(लगातार)
-संजय कुमार शर्मा राज़
Sunday, September 4, 2011
ग्राम्य-बाला
ग्राम्य-बाला
०५॰०९॰२०११
पूरब का क्षितिज भी नहीं लाल, सुबह तड़के उठ जाता कौन?
क्षिति भी जब अलसाई सोती और सन्नाटा, खग के मौन।
उनींदी अलसाई सोती, जिसने सुन मुर्गे की बोली,
स्वप्न को त्याग, कर्म के लिए,कमल दल पंखुड़ियां खोलीं।
दिन भर की थकी हुई वह देह, जलज के पट जैसी पलकें,
भूमि पर बिछा एक अम्बर, जिस पर सुंदरी घनी अलकें।
ऐसे में उठ जल लाकर शुद्ध, घर में भर आंगन देती लीप,
प्राकृतिक छटा का वह पर्याय, कीचड़ में पड़ी दमकती सीप।
नियमित प्रतिदिन सूर्योदय पूर्व, शीतल जल से करती स्नान,
और फिर रवि-किरणों के साथ, तुलसी को जल दे करती ध्यान।
भोर में तुलसी को दे जल, सांझ में करे समर्पित दीप,
काट हर तमस प्रज्जवलित किरण, ऐसे मोती भारत के सीप।
घर में सब बड़ों को दे सम्मान, समवयस्कों से करती प्यार,
अनुजों-छोटों को देती स्नेह और शिशुओं को करे दुलार।
किसी पर बिना मढ़े आरोप, करती वह सारे घर का काज,
सबको कर भोजन से संतृप्त, भले ही सीमित वहां अनाज।
कहीं वह पूज्य वंदिता मां, कहीं पत्नी पति-उर संदीप,
कहीं वह बाल सखी बाला, कहीं मोती प्रेमी उर-सीप।
कहीं बहना भाई के प्राण, कहीं तनया बाबुल का हंस,
कहीं रति कामदेव के संग, कहीं संरक्षित करती वंश।
जिसे नहीं बाधित करे अभाव, जिसका है स्वर्ग जन्म-क्षिति-ग्राम,
जिसका नैसर्गिक गठा शरीर, बताओ क्या है उसका नाम ?
जिसकी वाणी में अमृत बूंद, जिसके आकर्षण में हाला,
जिसका व्यक्तित्व धीर-गंभीर, रमणी चंचला ग्राम्य-बाला।
निकलकर हल-बैलों के संग, कान्त प्रियतम हैं जिसके साथ,
जाकर खेतों पर करती श्रम, लगाती क्षिति-मिट्टी को माथ।
कभी बीनकर गोबर लाकर कंडों का निर्माण करे,
कभी वनों से सूखी लकड़ी तोड़ बेच निर्वाह करे।
लाए वनोपज वन जाकर, विक्रय वह करती घूम स्वयं,
मिले मूल्य कम या अतिशय पर छू न गया हो जिसे अहम्।
घर के पशुधन की सेवा जो करती है बिन दुख पाए,
प्रेम-दया-कर्तव्य बीन से दुख जाए और सुख आए।
जिससे होती है परिभाषित, भारत के श्रमिक स्वेद की गंध,
ग्राम्य-बाला है श्रम का गीत, देश जन का अविजित निबंध।
जिसका श्रम-स्वेद मृदा की गंध, जिसका सौंदर्य हरित परिधान,
जिसका व्यवहार उचित, उस पर करे संपूर्ण देश अभिमान।
दिनभर के श्रमिक कार्य पश्चात, सांध्य देहरी जलाती दीप,
ग्रामों में उदित तभी सौभाग्य, दीप्त मोती मिलते हर सीप।
रात्रि सबको भोजन देकर, स्वयं जो शेष अन्न से तृप्त,
थकी सी देह लिए बाला, निद्रा की गोदी में परिक्षिप्त।
खाती श्रम कर उसे जलाती, स्वस्थ ग्राम्य वह बाला,
उर्जा-संरक्षण पाठ सिखाती, मेरे ज्ञान की शाला।
मातृभूमि का वह पर्याय, सहे सबकी, सबको सुख दे,
नहीं प्रकृति उसकी आलस्य, सहे दुःख पर किसको दुःख दे।
कीचड़ से लथ-पथ वह वनिता, बंटाती है गृहार्थ में हाथ,
जिसका गंतव्य मात्र सत्कर्म, सदा ईश्वर है उसके साथ।
छलकता पात्र,गठा सा गात्र, श्रमिक वह देहाक्षत ज्वाला,
नायिका आमंत्रण मदभरा, हाला पर्याय ग्राम्य बाला।
मदभरी बड़ी-बड़ी आंखें, जिसमें घर के घी का काजल,
बांहों में रजत नाँगमोरी, पैर रून-झुन करती पायल।
कह दो सावन की हरियाली या स्मृत भादो की रातें,
सुनकर अंतस हो जाए तृप्त, जिसकी प्यारी-प्यारी बातें।
सौंदर्य की देवी की वह मूर्ति, महुए के रस की पहली धार,
आंदोलित कान्त काम-आवेग, सुनकर रति की अस्फुट सीत्कार।
परन्तु वह कान्त समर्पित मात्र, शील जिसका तन आभूषण,
चरित्र जिसका जग सर्वोत्कृष्ट, करे कवि कलम कोटि शत नमन।
लाल बिन्दी सुहाग का दीप, जिसके होठों में प्रिय का गीत,
जगत विख्यात पवित्र सतीत्व, जिसका पति ही जिसका मनमीत।
जिसकी ज्वाला से जग हत्प्रभ, जिसके माथे पर वह सिंदूर,
रक्त जड़-जगत हिला दे जो, जिसके सम्मुख नतमस्तक शूर।
कभी वह पति चरणों की धूल, कभी वह दग्ध मरूस्थल रेत,
कभी देवस्थल शोभित फूल, कभी मकरानी पत्थर श्वेत।
जलाती दीवाली में दीप, खेलती होली में होली,
करे नवरातों में उपवास, लगाती चंदन और रोली।
दीवाली में दिए जलाती जो, होली में रंग देती जो घोल,
मिलनातुर कान्त के लिए जो, द्वार सब हिय के रखती खोल।
कभी दुलहन से जगमग चीर, चहकती कोयल सी बोली,
तीज-त्यौहारों में पहिने, घाघरा सतरंगी चोली।
कभी सुरभित सरसों का खेत, कभी वह गेहूं की बाली,
कभी वह पौष्टिक धानी मूंग, कभी वह उपज उड़द काली।
हिलाती धरा गज-गामिनी चाल, हिरनी सी चपल बजे संगीत,
ग्राम्य-बाला वह भारत की, देख जिसको जग जाए प्रीत।
धान की गेहूं की बाली या जो पीले सरसों का फूल,
छूकर जिसके चरणों की रज कृतार्थ है मेरे राष्ट्र की धूल।
ग्राम्य बाला जग में कहती, बलिदानी मिट्टी की गाथा,
लज्जा और त्यागमयी देवी से गर्वोन्मत भारत-माता।
कहीं वह सरस्वती विद्या, कहीं वह लक्ष्मी नारायण,
कहीं वह वेद-महाभारत, कहीं वह गीता-रामायण।
जिसका है धर्म अतिथि सत्कार और जो छल सम्मुख काली,
द्वेष रक्षार्थ काल दुर्गा, ग्राम्य-बाला भारत वाली।
ऐसी वह शीलमयी शीला, जिसको है धर्म-कर्म सब सम,
जिस मिट्टी की ऐसी बेटी, उसकी पूजा करते हैं हम।
धर्म के लिए सदा तत्पर, पूजा-उपवास-ध्यान-तप-जोग,
ग्राम्य-बाला वह भारत की, जिसकी पूजा करते सब लोग।
ग्रीष्म जग में वह शीतल चंद्र, क्षमा की मूर्ति, दया का स्त्रोत,
दिवाकर नमन करे जिसको जगमग वह तमसकाल खद्योत।
जौ-ज्वार, बाजरा, मक्का, सरसों, चांवल, गेहूं की रोटी,
करती शाकाहार शुद्ध वह, दुबली, पतली या मोटी।
मेरे ग्राम की बाला जो बलिदानी है, वह धन है,
जो मिटे मान के लिए देश-कवि करता उसे नमन है।
शील और लज्जा की मूर्ति, जिसे प्रिय बहुत आत्म-सम्मान,
जिसका चरित्र अनल उज्जवल, राष्ट्र उस पर करता अभिमान।
लगता था अम्बर, अम्बर से मिला नील परिधान,
जल, जल से मिल गया भामिनी, लज्जा से सम्मान।
पिक-वाणी जिसकी मनभावन, तनगठन पुष्ट जादूवाला,
लज्जा जिसका चिर आभूषण, मेरे भारत की ग्राम्यबाला।
वृक्ष जो दे जीवन का सुख, धरा वह धरे हरित परिधान,
ग्राम्य-बाला मंदिर देवी, त्याग और श्रम का वह प्रतिमान।
कभी वह दुर्गा का अवतार, कभी वह रणचंडी काली,
कभी वह लक्ष्मी-सरस्वती, कभी गायत्री बलशाली।
कभी वह सीता की सौम्यता, कभी वह राधा का श्रृंगार,
कभी वह ब्रह्मा की पुत्री, कभी गौरी-शंकर अभिसार।
कभी वह कर्म धाय पन्ना, कभी वह झांसी की रानी,
कभी पद्मिनी विराटा की, ग्राम्यबाला वह बलिदानी।
कभी वह कवच हिमालय का, कभी वह गंगा का पानी,
कभी लहराता सागर नीर, कभी चूनर धरती धानी।
हाथों में लाल-लाल चूड़ी, सीमित बहुमूल्य स्वर्ण कंगन,
कानों पर लटक रही बाली, कटि पर कलधौत रजत करधन।
कममूल्य पर साफ धुले कपड़े, बालों में वेणी फूलों की,
निष्कपट अंतस जिसका शुद्ध, उसे कब चिन्ता शूलों की।
निरख कर वह अप्रतिम सौंदर्य, लगे रणसंग्रामी रण खेत,
बालिका शांति संधि प्रतीक, देह पर वस्त्र धरे जब श्वेत।
ग्राम्य जीवन की सरलामृत, राष्ट्र का गौरव वह नारी,
कर्म, सेवा और धर्म प्रतीक, पड़े वह पुरूषों पर भारी।
सुन! अमरबेल की लता नहीं, मेरे भारत की बाला,
जो मूर्ख उसे परजीवी समझें, हो उनका मुंह काला।
लदी वह आम्र मौर शाखा, जिसकी वाणी वसंत नवगीत,
जिसका सामीप्य शीत बैरी, जगता स्वयमेव हृदय मन प्रीत।
स्वाभिमानी मन की देवी, क्रोध जिसका भड़की ज्वाला,
अरूणाई ज्येष्ट मास की जो, मेरे भारत की ग्राम्य-बाला।
भले हो देह जलाती रेत या कहीं फूलों की घाटी,
ग्राम्य-बाला से श्रम अभिप्रेत, ग्राम्य-बाला भारत माटी।
धूल-धुसरित और थका शरीर, सांझ पोखर का शीतल जल
जिसे फिर से कर दे जीवित और कहे संध्या दीपक जल।
थक जाती है जब दिन भर कर के घर-खेतों पर काम ,
करती है तब सौंदर्य, निशा की गोदी में विश्राम।
तब अहा! दैव सुंदरता फैली उसके मुख पर दिखती है,
मानों रति स्वयं सुगंध कलम से बाला का सुख लिखती है।
माथे पर का लट अनगढ़, काली नागिन सोई लगती है,
निद्रा देवी की बाहों में, कोई जोगन खोई लगती है।
कृपा तुम पर निर्माता की, किया है सप्तवर्ण का मेल,
अनगढ़ सौंदर्य रचा अद्भुत, हिलाता हिय रंगों का खेल।
हरीतिमा तुम हरियाली की, जीवन जल का तुम नीला रंग,
युवा नागिन से काले केश, भूरी मिट्टी निर्मित प्रत्यंग।
हलाहल नील शिरा उद्भित, गुलाब की कली गुलाबी तन,
रजत की चमक रक्त आभा, तुम्हारा कोमल स्वर्णिम मन।
त्याग बलिदान संतरा रंग, दृष्टि नीलाभ व्याप्त तुम व्योम,
मदमाती मीठी मधु मदिरा, पेय उत्कृष्ट श्वेत रस सोम।
तुमसे दूरी तन पीला रूग्ण, निकटता करती मुझको लाल,
होठों से च्युत हाला-प्याला तो लगता मुझे डस रहा व्याल।
तुम्हारा विरह भगवा बैराग, मिलन तुमसे सतरंगे गीत,
तुम ही हो इन्द्रधनुष मेरा, तुम ही हो मेरा मात्र मनमीत।
कली जूही की, फूल गुलाब, स्वर्ण रंग गेंदे की माला,
रात-रानी, चंपा, बेला, पुहुप पर्याय ग्राम्य बाला।
कभी तुम श्वेत ग्रीष्म की चमक, कभी जाड़े की पीली धूप,
कभी शिशु-वृद्ध भानु सम लाल, कभी चंदा सा उजला रूप।
कभी वह अरूणोदय पल धूप, कभी मदमस्त घटा घनश्याम,
कभी वह अस्थि जमाती शीत, प्रकृति उन्मुक्त छटा अभिराम।
कभी वह शीतल चंद्र-किरण, भानुकर कभी प्रखर जीवन,
कभी वह तम तारा उद्भास, कभी जुगनू जग-मग तन-मन।
कभी वर्षा का जीवन जल, कभी वह महाशीत की ओस,
कभी ग्रीष्मों की हाहाकार, कभी वह प्रिय अंतस संतोष।
कभी वह रूद्र दिवस सम सोम, कभी वह जीवन का मंगल,
कभी चंचला बुधा नारी, कभी गुरू के चरणों का जल।
कभी रति दर्प शुक्र की चमक, कभी शनि की पैनी तलवार,
प्रियतमा विभा सप्तऋषि पुंज, कभी रवि का झुलसाता प्यार।
चैत्र में जीवन का प्रारंभ, भानु का वह बैसाखी हर्ष,
ज्येष्ठ में प्रखर तपाती ग्रीष्म, वर्षा का आषाढ़ी उत्कर्ष।
सावन का हरियाली परिधान, भादो की श्याम निशा का गीत,
क्वांर का वह क्वांरा यौवन, कार्तिक में दीप जगाती प्रीत।
ठिठुराती अगहन की वह जाड़, पूस का शीघ्र बीतता दिवस,
माघ में रवि का मकर प्रवेश, फागुन में वह वसंत का यश।
बाला पल-घड़ी, दिवस, सप्ताह, शक्ति का स्त्रोत मास-नववर्ष,
जयंती रजत-स्वर्ण बाला, सुधा वह शताब्दियों का हर्ष।
तुम मेरा संपूर्ण वर्ष हो और षट्-ऋतु बारहमासा,
मृत हृदय रक्त संचार मेरे, तुम हो जीवन की प्रत्याशा।
प्रिया संपूर्ण सत्र संगीत, प्रेम की पूर्ण पाठशाला,
प्रकृति का अतुलनीय उपहार, सौंदर्य प्रतिमान ग्राम्यबाला।
छत्तीसगढ़ उर्जा का अक्षय स्त्रोत, देश भारत का अप्रतिम खंड,
यहां के श्रमिक जगद्विख्यात और बालाएं ज्योति प्रचंड।
बाला का वनवासी सौंदर्य, रंग मनभावन जिसे पसंद,
छरहरी वनबाला का खाद्य, मात्र फल, शाक-मूल और कंद।
कहीं वह महानदी अनुवाह, कहीं अरपा का कल-कल जल ,
कहीं वह लीलागर सुंदर, कहीं खारून बहे अविरल।
बोली छत्तीसगढ़ी सुमधुर, गोंडवाना की वनरानी,
मैकल पर्वत श्रेणी की छाप, जीवन जल हसदो का पानी।
संस्कारी वह नांदगांव का फूल, कभी वह रायपुरी सम्मान ,
कभी अभिमान कवर्धा की, कभी वह महासमुंद की तान।
बिलासा के श्रम का प्रतिमान, न्यायधानी नारी काली,
सरगुजा की अंबिका अंबिकापुरी, कभी दुर्गा वो दुर्ग वाली।
नारायणी नारायणपुर की, कभी वह बस्तर की हाला,
कभी वह रायगढ़ी शीला, जांजगीर-जशपुर की ज्वाला।
वो सर्वमंगला कोरबा की, कोरिया की चूनर धानी,
धमतरी की वो धाय शीला, दंतेवाड़ा की महारानी।
कभी वह बीजापुर का बीज, कभी बलरामपुरी माया,
प्रशस्त वह करे स्वर्ग का द्वार, देती पल पथिकों को छाया।
कहीं वह विद्या अध्ययनरत, कहीं वह रत कुम्हार का चाक,
कहीं सहती प्रताड़ना मूक, कहीं वह विदुषी करे अवाक्।
कभी वह धरा सजाती हल, श्रम से अल-मल उपजाती धान
मेरे छत्तीसगढ़ की बाला, भारत के हृदयस्थल का मान।
कभी बन जाती दावानल, धधकती प्रखर सत्य ज्वाला,
शीत ऋतु की गरमाती धूप, मेरे भारत की ग्राम्य-बाला।
यह भारत ग्रामों का है देश जिसकी संस्कृति विराट-उज्जवल,
उसमें छत्तीसगढ़ लखे विशेष, जहां की जनता बहुत सरल।
जग की रचना के दो उपकरण, पुरूष के संग धीर पुरूषार्थ,
कदाचित पुरूषों में कोई स्वार्थ, नारी का कार्य मात्र परमार्थ।
समझे जो इसे हेय वह मूर्ख, सदा से शोषित फिर भी बल,
उपेक्षा सहे बिना प्रतिकार, हृदय जिसका उज्जवल-निर्मल।
लज्जा और शील निरख अतुलित, है समझे मूर्ख जिसे अबला,
कार्य अनवरत करे श्रमसाध्य, संत जानें वह है सबला।
सृष्टि की रचना का जो मूल, जन्म देना है जिसका काम,
जीवों का जो करती सम्मान, जगत में उंचा जिसका नाम।
नारी-शक्ति की क्या तुलना, रखे जो जीव समेटे गर्भ,
वही सार्थक जीवन भावार्थ, वही सम्यक जीवन संदर्भ।
कभी वह तान ददरिया की, कभी है वह मांदर की थाप,
कभी वह करमा का संगीत, कभी नेवराती मंतर जाप।
कभी वह पनघट का सौंदर्य, सुरीली बंसी की वह तान,
गोपी सम कृष्ण-कन्हैया की, जाती है जो प्रतिदिन गौठान।
कभी वह सीता माता सम, कभी वह राधा का प्रतिरूप,
कभी गृहलक्ष्मी धन-वैभव, कभी वह जोगन मीरा धूप।
छत्तीसगढ़ की बाला सरला, जिसकी बातों में सम्मोहन,
धिक्कार है ऐसे लोगों पर, करें जो खनिज भूमि दोहन।
पालना सत्य धरे जो धर्म, जिसकी सेवा-सुश्रुषा निष्काम,
शक्ति का शक्ति देना काम, ग्राम्यबाला है उसका नाम।
प्रशंसक जिसकी यह जगती, जिसका स्वामी हृदयों वाला,
बताओ नारी है वह कौन? मेरे भारत की ग्राम्य-बाला।
---संजय कुमार शर्मा
०५॰०९॰२०११
पूरब का क्षितिज भी नहीं लाल, सुबह तड़के उठ जाता कौन?
क्षिति भी जब अलसाई सोती और सन्नाटा, खग के मौन।
उनींदी अलसाई सोती, जिसने सुन मुर्गे की बोली,
स्वप्न को त्याग, कर्म के लिए,कमल दल पंखुड़ियां खोलीं।
दिन भर की थकी हुई वह देह, जलज के पट जैसी पलकें,
भूमि पर बिछा एक अम्बर, जिस पर सुंदरी घनी अलकें।
ऐसे में उठ जल लाकर शुद्ध, घर में भर आंगन देती लीप,
प्राकृतिक छटा का वह पर्याय, कीचड़ में पड़ी दमकती सीप।
नियमित प्रतिदिन सूर्योदय पूर्व, शीतल जल से करती स्नान,
और फिर रवि-किरणों के साथ, तुलसी को जल दे करती ध्यान।
भोर में तुलसी को दे जल, सांझ में करे समर्पित दीप,
काट हर तमस प्रज्जवलित किरण, ऐसे मोती भारत के सीप।
घर में सब बड़ों को दे सम्मान, समवयस्कों से करती प्यार,
अनुजों-छोटों को देती स्नेह और शिशुओं को करे दुलार।
किसी पर बिना मढ़े आरोप, करती वह सारे घर का काज,
सबको कर भोजन से संतृप्त, भले ही सीमित वहां अनाज।
कहीं वह पूज्य वंदिता मां, कहीं पत्नी पति-उर संदीप,
कहीं वह बाल सखी बाला, कहीं मोती प्रेमी उर-सीप।
कहीं बहना भाई के प्राण, कहीं तनया बाबुल का हंस,
कहीं रति कामदेव के संग, कहीं संरक्षित करती वंश।
जिसे नहीं बाधित करे अभाव, जिसका है स्वर्ग जन्म-क्षिति-ग्राम,
जिसका नैसर्गिक गठा शरीर, बताओ क्या है उसका नाम ?
जिसकी वाणी में अमृत बूंद, जिसके आकर्षण में हाला,
जिसका व्यक्तित्व धीर-गंभीर, रमणी चंचला ग्राम्य-बाला।
निकलकर हल-बैलों के संग, कान्त प्रियतम हैं जिसके साथ,
जाकर खेतों पर करती श्रम, लगाती क्षिति-मिट्टी को माथ।
कभी बीनकर गोबर लाकर कंडों का निर्माण करे,
कभी वनों से सूखी लकड़ी तोड़ बेच निर्वाह करे।
लाए वनोपज वन जाकर, विक्रय वह करती घूम स्वयं,
मिले मूल्य कम या अतिशय पर छू न गया हो जिसे अहम्।
घर के पशुधन की सेवा जो करती है बिन दुख पाए,
प्रेम-दया-कर्तव्य बीन से दुख जाए और सुख आए।
जिससे होती है परिभाषित, भारत के श्रमिक स्वेद की गंध,
ग्राम्य-बाला है श्रम का गीत, देश जन का अविजित निबंध।
जिसका श्रम-स्वेद मृदा की गंध, जिसका सौंदर्य हरित परिधान,
जिसका व्यवहार उचित, उस पर करे संपूर्ण देश अभिमान।
दिनभर के श्रमिक कार्य पश्चात, सांध्य देहरी जलाती दीप,
ग्रामों में उदित तभी सौभाग्य, दीप्त मोती मिलते हर सीप।
रात्रि सबको भोजन देकर, स्वयं जो शेष अन्न से तृप्त,
थकी सी देह लिए बाला, निद्रा की गोदी में परिक्षिप्त।
खाती श्रम कर उसे जलाती, स्वस्थ ग्राम्य वह बाला,
उर्जा-संरक्षण पाठ सिखाती, मेरे ज्ञान की शाला।
मातृभूमि का वह पर्याय, सहे सबकी, सबको सुख दे,
नहीं प्रकृति उसकी आलस्य, सहे दुःख पर किसको दुःख दे।
कीचड़ से लथ-पथ वह वनिता, बंटाती है गृहार्थ में हाथ,
जिसका गंतव्य मात्र सत्कर्म, सदा ईश्वर है उसके साथ।
छलकता पात्र,गठा सा गात्र, श्रमिक वह देहाक्षत ज्वाला,
नायिका आमंत्रण मदभरा, हाला पर्याय ग्राम्य बाला।
मदभरी बड़ी-बड़ी आंखें, जिसमें घर के घी का काजल,
बांहों में रजत नाँगमोरी, पैर रून-झुन करती पायल।
कह दो सावन की हरियाली या स्मृत भादो की रातें,
सुनकर अंतस हो जाए तृप्त, जिसकी प्यारी-प्यारी बातें।
सौंदर्य की देवी की वह मूर्ति, महुए के रस की पहली धार,
आंदोलित कान्त काम-आवेग, सुनकर रति की अस्फुट सीत्कार।
परन्तु वह कान्त समर्पित मात्र, शील जिसका तन आभूषण,
चरित्र जिसका जग सर्वोत्कृष्ट, करे कवि कलम कोटि शत नमन।
लाल बिन्दी सुहाग का दीप, जिसके होठों में प्रिय का गीत,
जगत विख्यात पवित्र सतीत्व, जिसका पति ही जिसका मनमीत।
जिसकी ज्वाला से जग हत्प्रभ, जिसके माथे पर वह सिंदूर,
रक्त जड़-जगत हिला दे जो, जिसके सम्मुख नतमस्तक शूर।
कभी वह पति चरणों की धूल, कभी वह दग्ध मरूस्थल रेत,
कभी देवस्थल शोभित फूल, कभी मकरानी पत्थर श्वेत।
जलाती दीवाली में दीप, खेलती होली में होली,
करे नवरातों में उपवास, लगाती चंदन और रोली।
दीवाली में दिए जलाती जो, होली में रंग देती जो घोल,
मिलनातुर कान्त के लिए जो, द्वार सब हिय के रखती खोल।
कभी दुलहन से जगमग चीर, चहकती कोयल सी बोली,
तीज-त्यौहारों में पहिने, घाघरा सतरंगी चोली।
कभी सुरभित सरसों का खेत, कभी वह गेहूं की बाली,
कभी वह पौष्टिक धानी मूंग, कभी वह उपज उड़द काली।
हिलाती धरा गज-गामिनी चाल, हिरनी सी चपल बजे संगीत,
ग्राम्य-बाला वह भारत की, देख जिसको जग जाए प्रीत।
धान की गेहूं की बाली या जो पीले सरसों का फूल,
छूकर जिसके चरणों की रज कृतार्थ है मेरे राष्ट्र की धूल।
ग्राम्य बाला जग में कहती, बलिदानी मिट्टी की गाथा,
लज्जा और त्यागमयी देवी से गर्वोन्मत भारत-माता।
कहीं वह सरस्वती विद्या, कहीं वह लक्ष्मी नारायण,
कहीं वह वेद-महाभारत, कहीं वह गीता-रामायण।
जिसका है धर्म अतिथि सत्कार और जो छल सम्मुख काली,
द्वेष रक्षार्थ काल दुर्गा, ग्राम्य-बाला भारत वाली।
ऐसी वह शीलमयी शीला, जिसको है धर्म-कर्म सब सम,
जिस मिट्टी की ऐसी बेटी, उसकी पूजा करते हैं हम।
धर्म के लिए सदा तत्पर, पूजा-उपवास-ध्यान-तप-जोग,
ग्राम्य-बाला वह भारत की, जिसकी पूजा करते सब लोग।
ग्रीष्म जग में वह शीतल चंद्र, क्षमा की मूर्ति, दया का स्त्रोत,
दिवाकर नमन करे जिसको जगमग वह तमसकाल खद्योत।
जौ-ज्वार, बाजरा, मक्का, सरसों, चांवल, गेहूं की रोटी,
करती शाकाहार शुद्ध वह, दुबली, पतली या मोटी।
मेरे ग्राम की बाला जो बलिदानी है, वह धन है,
जो मिटे मान के लिए देश-कवि करता उसे नमन है।
शील और लज्जा की मूर्ति, जिसे प्रिय बहुत आत्म-सम्मान,
जिसका चरित्र अनल उज्जवल, राष्ट्र उस पर करता अभिमान।
लगता था अम्बर, अम्बर से मिला नील परिधान,
जल, जल से मिल गया भामिनी, लज्जा से सम्मान।
पिक-वाणी जिसकी मनभावन, तनगठन पुष्ट जादूवाला,
लज्जा जिसका चिर आभूषण, मेरे भारत की ग्राम्यबाला।
वृक्ष जो दे जीवन का सुख, धरा वह धरे हरित परिधान,
ग्राम्य-बाला मंदिर देवी, त्याग और श्रम का वह प्रतिमान।
कभी वह दुर्गा का अवतार, कभी वह रणचंडी काली,
कभी वह लक्ष्मी-सरस्वती, कभी गायत्री बलशाली।
कभी वह सीता की सौम्यता, कभी वह राधा का श्रृंगार,
कभी वह ब्रह्मा की पुत्री, कभी गौरी-शंकर अभिसार।
कभी वह कर्म धाय पन्ना, कभी वह झांसी की रानी,
कभी पद्मिनी विराटा की, ग्राम्यबाला वह बलिदानी।
कभी वह कवच हिमालय का, कभी वह गंगा का पानी,
कभी लहराता सागर नीर, कभी चूनर धरती धानी।
हाथों में लाल-लाल चूड़ी, सीमित बहुमूल्य स्वर्ण कंगन,
कानों पर लटक रही बाली, कटि पर कलधौत रजत करधन।
कममूल्य पर साफ धुले कपड़े, बालों में वेणी फूलों की,
निष्कपट अंतस जिसका शुद्ध, उसे कब चिन्ता शूलों की।
निरख कर वह अप्रतिम सौंदर्य, लगे रणसंग्रामी रण खेत,
बालिका शांति संधि प्रतीक, देह पर वस्त्र धरे जब श्वेत।
ग्राम्य जीवन की सरलामृत, राष्ट्र का गौरव वह नारी,
कर्म, सेवा और धर्म प्रतीक, पड़े वह पुरूषों पर भारी।
सुन! अमरबेल की लता नहीं, मेरे भारत की बाला,
जो मूर्ख उसे परजीवी समझें, हो उनका मुंह काला।
लदी वह आम्र मौर शाखा, जिसकी वाणी वसंत नवगीत,
जिसका सामीप्य शीत बैरी, जगता स्वयमेव हृदय मन प्रीत।
स्वाभिमानी मन की देवी, क्रोध जिसका भड़की ज्वाला,
अरूणाई ज्येष्ट मास की जो, मेरे भारत की ग्राम्य-बाला।
भले हो देह जलाती रेत या कहीं फूलों की घाटी,
ग्राम्य-बाला से श्रम अभिप्रेत, ग्राम्य-बाला भारत माटी।
धूल-धुसरित और थका शरीर, सांझ पोखर का शीतल जल
जिसे फिर से कर दे जीवित और कहे संध्या दीपक जल।
थक जाती है जब दिन भर कर के घर-खेतों पर काम ,
करती है तब सौंदर्य, निशा की गोदी में विश्राम।
तब अहा! दैव सुंदरता फैली उसके मुख पर दिखती है,
मानों रति स्वयं सुगंध कलम से बाला का सुख लिखती है।
माथे पर का लट अनगढ़, काली नागिन सोई लगती है,
निद्रा देवी की बाहों में, कोई जोगन खोई लगती है।
कृपा तुम पर निर्माता की, किया है सप्तवर्ण का मेल,
अनगढ़ सौंदर्य रचा अद्भुत, हिलाता हिय रंगों का खेल।
हरीतिमा तुम हरियाली की, जीवन जल का तुम नीला रंग,
युवा नागिन से काले केश, भूरी मिट्टी निर्मित प्रत्यंग।
हलाहल नील शिरा उद्भित, गुलाब की कली गुलाबी तन,
रजत की चमक रक्त आभा, तुम्हारा कोमल स्वर्णिम मन।
त्याग बलिदान संतरा रंग, दृष्टि नीलाभ व्याप्त तुम व्योम,
मदमाती मीठी मधु मदिरा, पेय उत्कृष्ट श्वेत रस सोम।
तुमसे दूरी तन पीला रूग्ण, निकटता करती मुझको लाल,
होठों से च्युत हाला-प्याला तो लगता मुझे डस रहा व्याल।
तुम्हारा विरह भगवा बैराग, मिलन तुमसे सतरंगे गीत,
तुम ही हो इन्द्रधनुष मेरा, तुम ही हो मेरा मात्र मनमीत।
कली जूही की, फूल गुलाब, स्वर्ण रंग गेंदे की माला,
रात-रानी, चंपा, बेला, पुहुप पर्याय ग्राम्य बाला।
कभी तुम श्वेत ग्रीष्म की चमक, कभी जाड़े की पीली धूप,
कभी शिशु-वृद्ध भानु सम लाल, कभी चंदा सा उजला रूप।
कभी वह अरूणोदय पल धूप, कभी मदमस्त घटा घनश्याम,
कभी वह अस्थि जमाती शीत, प्रकृति उन्मुक्त छटा अभिराम।
कभी वह शीतल चंद्र-किरण, भानुकर कभी प्रखर जीवन,
कभी वह तम तारा उद्भास, कभी जुगनू जग-मग तन-मन।
कभी वर्षा का जीवन जल, कभी वह महाशीत की ओस,
कभी ग्रीष्मों की हाहाकार, कभी वह प्रिय अंतस संतोष।
कभी वह रूद्र दिवस सम सोम, कभी वह जीवन का मंगल,
कभी चंचला बुधा नारी, कभी गुरू के चरणों का जल।
कभी रति दर्प शुक्र की चमक, कभी शनि की पैनी तलवार,
प्रियतमा विभा सप्तऋषि पुंज, कभी रवि का झुलसाता प्यार।
चैत्र में जीवन का प्रारंभ, भानु का वह बैसाखी हर्ष,
ज्येष्ठ में प्रखर तपाती ग्रीष्म, वर्षा का आषाढ़ी उत्कर्ष।
सावन का हरियाली परिधान, भादो की श्याम निशा का गीत,
क्वांर का वह क्वांरा यौवन, कार्तिक में दीप जगाती प्रीत।
ठिठुराती अगहन की वह जाड़, पूस का शीघ्र बीतता दिवस,
माघ में रवि का मकर प्रवेश, फागुन में वह वसंत का यश।
बाला पल-घड़ी, दिवस, सप्ताह, शक्ति का स्त्रोत मास-नववर्ष,
जयंती रजत-स्वर्ण बाला, सुधा वह शताब्दियों का हर्ष।
तुम मेरा संपूर्ण वर्ष हो और षट्-ऋतु बारहमासा,
मृत हृदय रक्त संचार मेरे, तुम हो जीवन की प्रत्याशा।
प्रिया संपूर्ण सत्र संगीत, प्रेम की पूर्ण पाठशाला,
प्रकृति का अतुलनीय उपहार, सौंदर्य प्रतिमान ग्राम्यबाला।
छत्तीसगढ़ उर्जा का अक्षय स्त्रोत, देश भारत का अप्रतिम खंड,
यहां के श्रमिक जगद्विख्यात और बालाएं ज्योति प्रचंड।
बाला का वनवासी सौंदर्य, रंग मनभावन जिसे पसंद,
छरहरी वनबाला का खाद्य, मात्र फल, शाक-मूल और कंद।
कहीं वह महानदी अनुवाह, कहीं अरपा का कल-कल जल ,
कहीं वह लीलागर सुंदर, कहीं खारून बहे अविरल।
बोली छत्तीसगढ़ी सुमधुर, गोंडवाना की वनरानी,
मैकल पर्वत श्रेणी की छाप, जीवन जल हसदो का पानी।
संस्कारी वह नांदगांव का फूल, कभी वह रायपुरी सम्मान ,
कभी अभिमान कवर्धा की, कभी वह महासमुंद की तान।
बिलासा के श्रम का प्रतिमान, न्यायधानी नारी काली,
सरगुजा की अंबिका अंबिकापुरी, कभी दुर्गा वो दुर्ग वाली।
नारायणी नारायणपुर की, कभी वह बस्तर की हाला,
कभी वह रायगढ़ी शीला, जांजगीर-जशपुर की ज्वाला।
वो सर्वमंगला कोरबा की, कोरिया की चूनर धानी,
धमतरी की वो धाय शीला, दंतेवाड़ा की महारानी।
कभी वह बीजापुर का बीज, कभी बलरामपुरी माया,
प्रशस्त वह करे स्वर्ग का द्वार, देती पल पथिकों को छाया।
कहीं वह विद्या अध्ययनरत, कहीं वह रत कुम्हार का चाक,
कहीं सहती प्रताड़ना मूक, कहीं वह विदुषी करे अवाक्।
कभी वह धरा सजाती हल, श्रम से अल-मल उपजाती धान
मेरे छत्तीसगढ़ की बाला, भारत के हृदयस्थल का मान।
कभी बन जाती दावानल, धधकती प्रखर सत्य ज्वाला,
शीत ऋतु की गरमाती धूप, मेरे भारत की ग्राम्य-बाला।
यह भारत ग्रामों का है देश जिसकी संस्कृति विराट-उज्जवल,
उसमें छत्तीसगढ़ लखे विशेष, जहां की जनता बहुत सरल।
जग की रचना के दो उपकरण, पुरूष के संग धीर पुरूषार्थ,
कदाचित पुरूषों में कोई स्वार्थ, नारी का कार्य मात्र परमार्थ।
समझे जो इसे हेय वह मूर्ख, सदा से शोषित फिर भी बल,
उपेक्षा सहे बिना प्रतिकार, हृदय जिसका उज्जवल-निर्मल।
लज्जा और शील निरख अतुलित, है समझे मूर्ख जिसे अबला,
कार्य अनवरत करे श्रमसाध्य, संत जानें वह है सबला।
सृष्टि की रचना का जो मूल, जन्म देना है जिसका काम,
जीवों का जो करती सम्मान, जगत में उंचा जिसका नाम।
नारी-शक्ति की क्या तुलना, रखे जो जीव समेटे गर्भ,
वही सार्थक जीवन भावार्थ, वही सम्यक जीवन संदर्भ।
कभी वह तान ददरिया की, कभी है वह मांदर की थाप,
कभी वह करमा का संगीत, कभी नेवराती मंतर जाप।
कभी वह पनघट का सौंदर्य, सुरीली बंसी की वह तान,
गोपी सम कृष्ण-कन्हैया की, जाती है जो प्रतिदिन गौठान।
कभी वह सीता माता सम, कभी वह राधा का प्रतिरूप,
कभी गृहलक्ष्मी धन-वैभव, कभी वह जोगन मीरा धूप।
छत्तीसगढ़ की बाला सरला, जिसकी बातों में सम्मोहन,
धिक्कार है ऐसे लोगों पर, करें जो खनिज भूमि दोहन।
पालना सत्य धरे जो धर्म, जिसकी सेवा-सुश्रुषा निष्काम,
शक्ति का शक्ति देना काम, ग्राम्यबाला है उसका नाम।
प्रशंसक जिसकी यह जगती, जिसका स्वामी हृदयों वाला,
बताओ नारी है वह कौन? मेरे भारत की ग्राम्य-बाला।
---संजय कुमार शर्मा
Tuesday, August 23, 2011
फ़लसफ़ा-ए-राज़
फ़लसफ़ा-ए-राज़
२३॰०८॰२०११
"कर दे मुर्दा नसों को रवाँ आदमी,
कर दे ग़ुज़रे पलों को जवाँ आदमी।
जब भी बाग़ी हुआ ,सल्तनत के लिये,
कर दे खुद ही खड़ा कारवाँ आदमी,
जब आमादा हुआ वो चमन के लिये,
ज़हाँ में सबसे बड़ा बाग़बाँ आदमी,
जब ज़रूरत पड़ी तो वो ठंडी हवा,
जब ज़रूरत पड़ी तो तूफ़ाँ आदमी,
ईश़्क़ है आग़ का एक दरिया मग़र,
आज़माईश में शाहेज़हाँ आदमी,
उसकी दुनिया में देखो,जहाँ तक भी तुम,
बस यहाँ आदमी और वहाँ आदमी,
आए वहश़ी-दरिन्दे जो लूटे और गए,
पर जो मिट न सका वो निशाँ आदमी,
औ
ग़र ख़ुदाई को क़त्ल "राज़" तुमने किया,
तो फिर ज़माने में बाक़ी कहाँ आदमी।"
(लगातार)
-संजय कुमार शर्मा "राज़"
२३॰०८॰२०११
"कर दे मुर्दा नसों को रवाँ आदमी,
कर दे ग़ुज़रे पलों को जवाँ आदमी।
जब भी बाग़ी हुआ ,सल्तनत के लिये,
कर दे खुद ही खड़ा कारवाँ आदमी,
जब आमादा हुआ वो चमन के लिये,
ज़हाँ में सबसे बड़ा बाग़बाँ आदमी,
जब ज़रूरत पड़ी तो वो ठंडी हवा,
जब ज़रूरत पड़ी तो तूफ़ाँ आदमी,
ईश़्क़ है आग़ का एक दरिया मग़र,
आज़माईश में शाहेज़हाँ आदमी,
उसकी दुनिया में देखो,जहाँ तक भी तुम,
बस यहाँ आदमी और वहाँ आदमी,
आए वहश़ी-दरिन्दे जो लूटे और गए,
पर जो मिट न सका वो निशाँ आदमी,
औ
ग़र ख़ुदाई को क़त्ल "राज़" तुमने किया,
तो फिर ज़माने में बाक़ी कहाँ आदमी।"
(लगातार)
-संजय कुमार शर्मा "राज़"
फ़लसफ़ा-ए-राज़
फ़लसफ़ा-ए-राज़
२३॰०८॰२०११
"कर दे मुर्दा नसों को रवाँ आदमी,
कर दे ग़ुज़रे पलों को जवाँ आदमी।
जब भी बाग़ी हुआ ,सल्तनत के लिये,
कर दे खुद ही खड़ा कारवाँ आदमी,
जब आमादा हुआ वो चमन के लिये,
ज़हाँ में सबसे बड़ा बाग़बाँ आदमी,
जब ज़रूरत पड़ी तो वो ठंडी हवा,
जब ज़रूरत पड़ी तो तूफ़ाँ आदमी,
ईश़्क़ है आग़ का एक दरिया मग़र,
आज़माईश में शाहेज़हाँ आदमी,
उसकी दुनिया में देखो,जहाँ तक भी तुम,
बस यहाँ आदमी और वहाँ आदमी,
आए वहश़ी-दरिन्दे जो लूटे और गए,
पर जो मिट न सका वो निशाँ आदमी,
औ
ग़र ख़ुदाई को क़त्ल "राज़" तुमने किया,
तो फिर ज़माने में बाक़ी कहाँ आदमी।"
(लगातार)
-संजय कुमार शर्मा "राज़"
२३॰०८॰२०११
"कर दे मुर्दा नसों को रवाँ आदमी,
कर दे ग़ुज़रे पलों को जवाँ आदमी।
जब भी बाग़ी हुआ ,सल्तनत के लिये,
कर दे खुद ही खड़ा कारवाँ आदमी,
जब आमादा हुआ वो चमन के लिये,
ज़हाँ में सबसे बड़ा बाग़बाँ आदमी,
जब ज़रूरत पड़ी तो वो ठंडी हवा,
जब ज़रूरत पड़ी तो तूफ़ाँ आदमी,
ईश़्क़ है आग़ का एक दरिया मग़र,
आज़माईश में शाहेज़हाँ आदमी,
उसकी दुनिया में देखो,जहाँ तक भी तुम,
बस यहाँ आदमी और वहाँ आदमी,
आए वहश़ी-दरिन्दे जो लूटे और गए,
पर जो मिट न सका वो निशाँ आदमी,
औ
ग़र ख़ुदाई को क़त्ल "राज़" तुमने किया,
तो फिर ज़माने में बाक़ी कहाँ आदमी।"
(लगातार)
-संजय कुमार शर्मा "राज़"
Monday, August 22, 2011
मैक़दा-ए-राज़
मैक़दा-ए-राज़
१८॰०८॰२०११
"चलो बैठें किसी खुले में ,वहीँ शराब पिएँ,
करे जो दिल को तरो-ताज़ा ,वो इन्क़लाब पिएँ ।
पिएँ दरख्तों की छाँव में हम ,उन्हीँ के पत्तों में,
नमूना मेहनत का जो मिलता है श़हद के छत्तों में,
ख़ुदा ! बहती हवा से ,मिट्टी से जो जवाँ रौशन,
हया की साक़ी से ज़मीं-ग़र्दूं का ,हम शबाब पिएँ,
चलो बैठें किसी खुले में ,वहीँ शराब पिएँ ।
शराब ! कौन सी उसका भी बयाँ ज़रूरी है,
बनी जिसकी भी हो उसका होना जवाँ ज़रूरी है,
बाख़ुदा ! दहशत से आदमी है ,यहाँ टूट चुका,
मरी नसों को कर दे ज़िन्दा वो आफ़ताब पिएँ,
चलो बैठें किसी खुले में ,वहीँ शराब पिएँ ।
यहाँ तो पानी में भी मुर्दों का ख़ून मिलता है,
ज़िन्दा रहते तक जंगलों का क़ानून मिलता है,
हम तो इन्साँ हैं "राज़" कुछ भी खा-पी सकते हैं,
गिरे जो ग़र्दूँ से ख़ूने "राज़" वो माहताब पिएँ,
चलो बैठें किसी खुले में ,वहीँ शराब पिएँ ।
हो दिन का वक़्त तो रुख़ पर नक़ाब ले के चलें,
उल्टे-सीधे सवालों के सब ,जवाब ले के चलें,
ये है दुनिया ,कोई भी ,कुछ भी ,कहीं भी बक देगा,
जा के बैठें किसी वीराने में हम ,शबाब पिएँ,
चलो बैठें किसी खुले में ,वहीँ शराब पिएँ ।
शराब हमदम, मेरी महबूबा ,ये ही अजीज़ मेरा,
मेरा ख़ुदा है ,कोई फ़रिश्ता ,ये ही हफ़ीज़ मेरा,
जहाँ है क़ब्र जहाँ अब दम ये मेरा घुटता है,
गिरे जो ग़र्दूँ से हलावत वो लाज़वाब पिएँ,
चलो बैठें किसी खुले में ,वहीँ शराब पिएँ ।
शराब लिखी ,ज़िग़र के ख़ूँ से ,जो है हबीब मेरा,
मेरा गुज़रा कल,आने वाला कल औ नसीब मेरा,
ज़माने वाले बड़े तंग़दिल हैं,ये तो पढ़े न लिखे,
रूहानी लफ़्ज़ों में लिखी हम ,कोई क़िताब पिएँ,
चलो बैठें किसी खुले में ,वहीँ शराब पिएँ ।
उम्र गुज़रे है बग़ैर मय के बड़ी मुश्क़िल से यहाँ,
क्यों नहीं मिलता ग़रीब से वो रईस दिल से यहाँ,
चलो हम तोड़ें ,उंची-नीची औ आड़ी-तिरछी हदें,
एक ही प्याले में बारी-बारी से ,हम नवाब पिएँ,
चलो बैठें किसी खुले में ,वहीँ शराब पिएँ ।"
-----संजय कुमार शर्मा "राज़"
१८॰०८॰२०११
"चलो बैठें किसी खुले में ,वहीँ शराब पिएँ,
करे जो दिल को तरो-ताज़ा ,वो इन्क़लाब पिएँ ।
पिएँ दरख्तों की छाँव में हम ,उन्हीँ के पत्तों में,
नमूना मेहनत का जो मिलता है श़हद के छत्तों में,
ख़ुदा ! बहती हवा से ,मिट्टी से जो जवाँ रौशन,
हया की साक़ी से ज़मीं-ग़र्दूं का ,हम शबाब पिएँ,
चलो बैठें किसी खुले में ,वहीँ शराब पिएँ ।
शराब ! कौन सी उसका भी बयाँ ज़रूरी है,
बनी जिसकी भी हो उसका होना जवाँ ज़रूरी है,
बाख़ुदा ! दहशत से आदमी है ,यहाँ टूट चुका,
मरी नसों को कर दे ज़िन्दा वो आफ़ताब पिएँ,
चलो बैठें किसी खुले में ,वहीँ शराब पिएँ ।
यहाँ तो पानी में भी मुर्दों का ख़ून मिलता है,
ज़िन्दा रहते तक जंगलों का क़ानून मिलता है,
हम तो इन्साँ हैं "राज़" कुछ भी खा-पी सकते हैं,
गिरे जो ग़र्दूँ से ख़ूने "राज़" वो माहताब पिएँ,
चलो बैठें किसी खुले में ,वहीँ शराब पिएँ ।
हो दिन का वक़्त तो रुख़ पर नक़ाब ले के चलें,
उल्टे-सीधे सवालों के सब ,जवाब ले के चलें,
ये है दुनिया ,कोई भी ,कुछ भी ,कहीं भी बक देगा,
जा के बैठें किसी वीराने में हम ,शबाब पिएँ,
चलो बैठें किसी खुले में ,वहीँ शराब पिएँ ।
शराब हमदम, मेरी महबूबा ,ये ही अजीज़ मेरा,
मेरा ख़ुदा है ,कोई फ़रिश्ता ,ये ही हफ़ीज़ मेरा,
जहाँ है क़ब्र जहाँ अब दम ये मेरा घुटता है,
गिरे जो ग़र्दूँ से हलावत वो लाज़वाब पिएँ,
चलो बैठें किसी खुले में ,वहीँ शराब पिएँ ।
शराब लिखी ,ज़िग़र के ख़ूँ से ,जो है हबीब मेरा,
मेरा गुज़रा कल,आने वाला कल औ नसीब मेरा,
ज़माने वाले बड़े तंग़दिल हैं,ये तो पढ़े न लिखे,
रूहानी लफ़्ज़ों में लिखी हम ,कोई क़िताब पिएँ,
चलो बैठें किसी खुले में ,वहीँ शराब पिएँ ।
उम्र गुज़रे है बग़ैर मय के बड़ी मुश्क़िल से यहाँ,
क्यों नहीं मिलता ग़रीब से वो रईस दिल से यहाँ,
चलो हम तोड़ें ,उंची-नीची औ आड़ी-तिरछी हदें,
एक ही प्याले में बारी-बारी से ,हम नवाब पिएँ,
चलो बैठें किसी खुले में ,वहीँ शराब पिएँ ।"
-----संजय कुमार शर्मा "राज़"
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