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Saturday, January 19, 2013

मैकदा-ए-राज़

मैकदा-ए-राज़
१४॰९॰९३, 8 PM

बिना शराब मेरी शब नहीं,सहर भी नहीं ।

ये वो जहाँ है,जहाँ जान की क़दर भी नहीं,
बिना शराब मेरी शब नहीं,सहर भी नहीं ।

चौबीसों घंटे मेरे पीने का वक्त होता है,
राज़ सुबहा वज़ू शराब से मुँह धोता है,
पीता है वो पाँचो वक़्त उफ़ मगर भी नहीं,
बिना शराब मेरी शब नहीं,सहर भी नहीं ।

जामो महफिल ज़न्नती बू से महकती सी लगे,
हलक़ से उतरे ज़िगर,आग दहकती सी लगे,
जहाँ ये चीज़ नहीं मिलती,है वो शहर ही नहीं,
बिना शराब मेरी शब नहीं,सहर भी नहीं ।

घंटे-घंटे में,घूँट-घूँट,धीरे-धीरे तू पी,
लम्हा-लम्हा हो आशिकाना,खुशगवार तू जी,
इस जहाँ में शराब जैसी हमनज़र ही नहीं,
बिना शराब मेरी शब नहीं,सहर भी नहीं ।

समंदरों में बूँद-बूँद गिर के पानी भरे,
क़तरा-क़तरा तमीज़ से लहू इंसानी भरे,
हुक़्मे क़ाइनात के बिना उठे लहर भी नहीं,
बिना शराब मेरी शब नहीं,सहर भी नहीं ।

आज़मा कर के देख लो,ये ज़हर जला देगा,
अग़र हो लाश बन चुके तो भी ये चला देगा,
बग़ैर जाम हलावत नहीं,ज़हर भी नहीं,
बिना शराब मेरी शब नहीं,सहर भी नहीं ।
॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰(लगातार)

-संजय कुमार शर्मा राज़

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