Monday, August 22, 2011
मैकदा-ए-राज़
मैकदा-ए-राज़
माह-ए-बरसात में आऒ,चलो शराब पिएँ,
है बड़ी नेमत का महीना बेहिसाब पिएँ,
माह-ए-बरसात में आऒ,चलो शराब पिएँ।
चलो पिएँगे वो शराब जो खुदा ने दी है,
उसकी मर्ज़ी से इस जहाँ में बदी है,नेक़ी है,
रास्ता भी उसी का तय किया हुआ है यहाँ,
चलते-चलते,बैठते-उठते ,चलो सवाब पिएँ,
माह-ए-बरसात में आऒ,चलो शराब पिएँ।
पिएँ मोहब्बत की आग और लड़ें हम नफ़रत से,
बनें इन्सान हम,उठें जानवर की फ़ितरत से,
नज़र में उसकी नहीं छोटे-बड़े के पैमाने,
अमीर और ग़रीब सब हैं यहाँ नवाब पिएँ,
माह-ए-बरसात में आऒ,चलो शराब पिएँ।
क़सम लें आऒ,नहीं लड़ेंगे भाई-भाई से,
यही कहना है मुझे हिन्दू से,सिक्ख,ईसाई से,
मैं मुसलमान हूँ,नमाज़ी पाँचो वक्त का हूँ,
आब-ए-जमज़म की घूँट है ये लाज़वाब पिएँ,
माह-ए-बरसात में आऒ,चलो शराब पिएँ।
कोई मसला न रहे बाक़ी ,राज़ रिन्दों में,
उठें कबर से,चलो शामिल हो जाएँ ज़िन्दों में,
मिलाएँ हाथ दोस्ती के,दुश्मनी ख़त्म कर,
हर एक घूँट में,हर सवाल का जवाब पिएँ,
माह-ए-बरसात में आऒ,चलो शराब पिएँ।
॰॰॰॰॰॰॰॰॰(लगातार)
-संजय कुमार शर्मा राज़
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बहुत सुन्दर संजय जी ..
ReplyDeleteWord Verification हटा दीजिए ..कमेन्ट करने में समय लगता है इसमें..
hriday se aabhaar aapka
ReplyDelete,Aravind Bhaiya...ye Word Verification kaise hatana hai...please guide me...